दाखिल खारिज यानी ज़मीन के अभिलेख में नामांतरण: बिक्री, दान या विरासत के बाद नए धारक का नाम खतौनी में दर्ज होता है और पुराना नाम हटता है। इस लेख में उत्तर प्रदेश में दाखिल खारिज का कानून, ऑनलाइन प्रक्रिया, दस्तावेज़ और समय-सीमा सरल भाषा में दी गई है।

दाखिल खारिज क्या है?
“दाखिल” का अर्थ है दर्ज करना और “खारिज” का अर्थ है हटाना। नामांतरण होने तक राजस्व अभिलेख में पुराने धारक का नाम ही रहता है, जिससे ज़मीन बेचने, बंधक रखने या बंटवारे में परेशानी होती है।
दाखिल खारिज का कानून
कृषि भूमि का नामांतरण उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अध्याय 5 से नियंत्रित होता है:
- धारा 33: विरासत से भूमि पाने वाला व्यक्ति राजस्व निरीक्षक को सूचना देता है।
- धारा 34: अंतरण (कुटुंब समझौते सहित) से भूमि पाने वाला व्यक्ति तहसीलदार को सूचना देता है। राज्य सरकार इसके लिए शुल्क तय कर सकती है।
- धारा 35: तहसीलदार उद्घोषणा जारी कर जांच करता है और खतौनी संशोधित करने का आदेश देता है। आदेश से 30 दिन के भीतर उपजिलाधिकारी के यहां अपील होती है।
- धारा 39: नामांतरण आदेश के बावजूद कोई भी व्यक्ति वाद द्वारा अपना अधिकार सिद्ध कर सकता है।
बिक्री के बाद दाखिल खारिज: चरणबद्ध प्रक्रिया
- बैनामे का पंजीकरण। रजिस्ट्री के बाद उसका विवरण राजस्व न्यायालय कंप्यूटरीकृत प्रबंधन प्रणाली (RCCMS) को भेजा जाता है।
- ऑनलाइन आवेदन। vaad.up.nic.in पर मोबाइल नंबर और OTP से लॉग इन करें, रजिस्ट्री संख्या और तारीख दर्ज कर धारा 34 का आवेदन जमा करें और प्रिंट रखें।
- शुल्क राज्य द्वारा तय दर से जमा करें।
- उद्घोषणा। तहसीलदार आपत्तियां मांगने के लिए सार्वजनिक सूचना जारी करता है।
- लेखपाल रिपोर्ट। लेखपाल या राजस्व निरीक्षक कब्ज़े की जांच कर रिपोर्ट देता है।
- आदेश। आपत्ति न होने पर तहसीलदार खतौनी संशोधित करने का आदेश देता है।
- अभिलेख जांचें। नई प्रविष्टि यूपी भूलेख पर देखें और प्रमाणित प्रति रखें।
विरासत (वरासत) के बाद दाखिल खारिज
भूमिधर की मृत्यु के बाद वारिस धारा 33 के तहत सूचना देते हैं। निर्विवाद मामले में राजस्व निरीक्षक वारिसों के नाम खतौनी में दर्ज करता है। विवाद होने पर वह जांच कर मामला तहसीलदार को भेजता है। जिस वारिस का नाम छूट गया हो, वह तहसीलदार के यहां आवेदन कर सकता है।
दाखिल खारिज के लिए दस्तावेज़
- पंजीकृत बैनामा, दानपत्र या कुटुंब समझौता
- विरासत में: मृत्यु प्रमाणपत्र और सभी वारिसों का विवरण
- पिछले धारक के नाम वाली खतौनी
- आवेदक का आधार या अन्य पहचान पत्र
- खसरा/गाटा संख्या और गांव का विवरण
- शुल्क रसीद और आवेदन का प्रिंट
दाखिल खारिज में कितना समय लगता है?
राजस्व परिषद ने निर्देश दिए हैं कि निर्विवाद नामांतरण 45 दिन में और विवादित मामले 90 दिन में निपटाए जाएं, और देरी के लिए जिले के अधिकारी जवाबदेह होंगे। वास्तविक समय लेखपाल रिपोर्ट और आपत्तियों पर भी निर्भर करता है।

आपत्ति और अपील
आपत्ति आने पर मामला विवादित हो जाता है और तहसीलदार दोनों पक्षों को सुनकर निर्णय करता है। आदेश से असंतुष्ट व्यक्ति धारा 35(2) के तहत 30 दिन के भीतर उपजिलाधिकारी के यहां अपील कर सकता है।
नामांतरण स्वामित्व का प्रमाण नहीं
दाखिल खारिज की प्रविष्टि केवल राजस्व उद्देश्य के लिए होती है; इससे स्वामित्व न बनता है न समाप्त होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने जितेंद्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2021) में यही दोहराया। स्वामित्व का विवाद दीवानी न्यायालय तय करता है।
लखनऊ शहर के मकान और फ्लैट
राजस्व संहिता की प्रक्रिया खतौनी में दर्ज भूमि पर लागू होती है। शहर के मकान या फ्लैट के लिए नगर निगम के गृहकर अभिलेख में और आवंटित संपत्ति के लिए विकास प्राधिकरण में अलग से नामांतरण कराना होता है।

दाखिल खारिज पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या दाखिल खारिज का आवेदन ऑनलाइन हो सकता है?
हां। धारा 34 का आवेदन vaad.up.nic.in पर रजिस्ट्री संख्या और तारीख से किया जा सकता है, और उसी पोर्टल पर स्थिति देखी जा सकती है।
45 दिन बाद भी नामांतरण लंबित हो तो?
तहसीलदार और ज़रूरत हो तो उपजिलाधिकारी को लिखित अनुरोध दें। IGRS जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत भी दर्ज की जा सकती है।
क्या दाखिल खारिज से स्वामित्व सिद्ध होता है?
नहीं। यह केवल राजस्व अभिलेख अद्यतन करता है। स्वामित्व आपके स्वत्व दस्तावेज़ों पर निर्भर है।
सहायता चाहिए?
हमारे प्रॉपर्टी वकील लखनऊ दाखिल खारिज, वरासत, अभिलेख सुधार और ज़मीन विवादों में सहायता करते हैं। परामर्श बुक करें या हमसे संपर्क करें। अंग्रेज़ी में पढ़ें: Dakhil kharij in UP।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और कानूनी सलाह या आग्रह नहीं है। पोर्टल की सुविधाएं और प्रक्रियाएं समय-समय पर बदलती रहती हैं; कृपया आधिकारिक वेबसाइट पर पुष्टि करें।

